हाईकोर्ट ने शनिवार को स्पष्ट किया कि पोता या पोती अपने माता-पिता के जीवित रहते संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा नहीं कर सकते। यह आदेश अदालत ने एक सिविल याचिका को खारिज करते हुए दिया। इसमें याचिकाकर्ता कृतिका जैन ने पिता राकेश जैन और चाची नीना जैन के खिलाफ दिल्ली की एक संपत्ति में एक चौथाई हिस्सेदारी का दावा किया था। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने यह निर्णय सुनाया कि कृतिका के दावे में कोई कानूनी आधार नहीं है। दादी-पोती का दर्जा प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी के रूप में नहीं आता जब तक उसके माता-पिता जीवित हैं।
कृतिका के दिवंगत दादा पवन कुमार जैना की तरफ से जो संपत्ति खरीदी गई थी हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा आठ के तहत केवल उनकी विधवा और संतान में ही विभाजित होती है। वर्ष 1956 के बाद से प्रथम श्रेणी उत्तराधिकारी की संपत्ति उनका व्यक्तिगत स्वामित्व बन गई है जो संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं मानी जाएगी।
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